सहसंपादक - आसिफ अंसारी
बरेली सुनियो की शान सुनियो की जान इमाम अहमद राजा खान का तीन रोज उर्स का आगाज हो चुका है देश के कोने-कोने से जायरीन पहुंच रहे हैं उनके लबों पर,सिर्फ आला हजरत की गूंज सुनाई दे रही थी। पूरा माहौल बदल चुका था। जहां देखों वहां सिर्फ जायरीन और धार्मिक आयाेजन ही दिखाई दे रहे थे। ये नजारा है आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी के 105 वें उर्स का।
उर्स मे 2019 से पाकिस्तान के बड़ी संख्या में जायरीन आने के लिए तड़प रहे हैं,आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी के 100 व उर्स के मौके पर शिरकत करने के लिए पाकिस्तानी के जायरीन आए थे उसके बाद से आज तक पाकिस्तानी जायरीन अटारी बार्डर पार नहीं कर सके और यही वजह है कि वह दरगाह आला हजरत आने के लिए बेताब है तड़पते हैं और हर बार उर्स के मौके पर पाक की मस्जिदों में उर्स ए आला हजरत मनाते हैं,
आला हजरत के सबसे बड़े बेटे मुफ्ती हामिद रजा खान, दरगाह के पहले सज्जाद नशीं बने. उसके बाद दूसरे सज्जादा नशीं बने मौलाना इब्राहिम रजा खान, तीसरे मौलाना रेहान रजा खान को, चौथे मौलाना सुभान रजा खान को और इस समय मुफ्ती अहसान रजा खान कादरी दरगाह आला हजरत के सज्जादा नशीं हैं. इस सूची में मुफ्ती मुस्तफा रजा भी शामिल हैं. मुफ्ती अख्तर रजा खान अजहरी भी इसी लिस्ट में आते हैं.दरगाह से जुड़े कुछ धार्मिक मदरसे हैं, जिन्हें आला हजरत और उनके परिवार द्वारा स्थापित किया गया है. यह आज भी चल रहे हैं. यहां से आज भी फतवे जारी किए जाते हैं. इसके लिए देश के महान मुफ्ती की टीम काम करती है.
आला हजरत दरगाह से निकला हुआ फतवे ने कई बार सरकार को झकझोर कर रख दिया . सत्तर के दशक में, जब आपातकाल और नसबंदी लागू हुई थी, तब नसबंदी के खिलाफ फतवे जारी किए गए थे. यहां से हाफिज सईद और आतंकवाद के खिलाफ भी फतवे जारी किए जा चुके हैं.आला हजरत के ज्येष्ठ पुत्र मौलाना अहमद रजा खान ने कुलीन परिवार की बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाया है. उन्हें ‘हुज्जत-उल-इस्लाम‘ की उपाधि से याद किया जाता है. उन्हें अपने पिता से भी तालीम मिली है. उनके अनुयायी भी बड़ी संख्या में मुफ्ती अख्तर रजा खान अजहरी की विरासत को उनके 51वर्षीय बेटे मुफ्ती असजद रजा खान बरेलवी आगे बढ़ा रहे हैं. वह अपने पिता द्वारा स्थापित मदरसे के प्रभारी भी हैं. उन्होंने आतंकवादी और चरमपंथी विचारधाराओं के खिलाफ भी बात की है.इस कुलीन परिवार के सदस्यों को आमतौर पर राजनीति से दूर धार्मिक और आध्यात्मिक भूमिकाओं में देखे जाते हैं।
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संपादक अंकित सक्सेना(एडवोकेट )




